काले चने के पकौड़े के लिए एक कटोरी काले चने को 3-4 घंटे भिगो देंगे .........उसके बाद इसमें 3-4 कलियाँ लहसुन,एक इंच अदरख ,3-4 हरी मिर्च के साथ आधे कप पानी के साथ मिक्सी में पीस लेंगे .......पीसने के बाद इसमें एक बारीक़ कटा प्याज़ ,एक छोटा चम्मच गर्म मसाला ,बारीक़ कटा हरा घनियाँ स्वादनुसार नमक डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लेंगे .........उसके बाद गर्म तेल में तल लेंगे .........गर्मागर्म ......हरी चटनी के साथ परोसें .........:)
Sunday, January 13, 2013
कहते है कि समाज में लोग लड़का और लड़की में
भेद -भाव करते हैं .......लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि क्या हम खुद ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ? हमने ही बच्चों के कोमल मन में कुछ नकारत्मक सवालों के बीज नहीं बोये हैं ?
हमारी एक मित्र हैं जिनकी बेटी जन्मदिन के अवसर पर किसी ने उसे किचन सेट गिफ्ट में दिया ........इस पर हमारी मित्र थोड़ी नाराज़ हो गईं औ
र कहने लगीं की लोग लोग लडकियों को अक्सर किचन सेट या डॉल वैगरह गिफ्ट में देते हैं जो मुझे अच्छा नहीं लगता ............मुझे इस सोंच पर बहुत हैरानी हुई क्योंकि वह एक बहुत ही पढ़ी लिखी प्रगतिशील विचारों वाली महिला हैं .................मुझे समझ नहीं आता की कोई भी काम कोई भी खेल या जिंदगी का कोई भी छेत्र कैसे निर्धारित कर सकता की ये काम प्रथम दर्जे का है और ये काम दोयम दर्जे का है ??......
ये सौ प्रतिशत हमारी सोंच पर निर्भर करता है ........मैं एक हाउस वाइफ हूँ लेकिन मैंने कभी भी अपने आप को दोयम दर्जे का नहीं समझा अगर हम अपने आपको को ही अपनी नजरों में
नहीं उठा सकते तो फिर दुसरे की नजर से सम्मान पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ............
हमने खुद ही ये निर्धारित कर रखा है कि लड़कों द्वारा किया जाने वाला हर काम प्रथम दर्जे का है और घर -गृहस्थी के सारे काम दोयम दर्जे का क्योंकि ऐसा मानना है की इन सब कामों को करने के लिये किसी तरह की ज्ञान या रचनात्मकता की आवश्यकता नहीं है ............
मुझे हंसी आती है इस तरह की सोंच रखने वाले सो कॉल्ड इंटेलेक्चुअल के उपर ................ये क्या जाने कि होम मनाग्मेंट नाम की भी एक चीज़ होती है इसमें कहीं ज्यादा ज्ञान और रचनात्मकता की आवश्यकता की जरूरत होती है ...........इसलिए प्लीज अपनी सोंच को जरा उड़ान भरने दें ,पंख खोलने दें फिर हर काम
भेद -भाव करते हैं .......लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि क्या हम खुद ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ? हमने ही बच्चों के कोमल मन में कुछ नकारत्मक सवालों के बीज नहीं बोये हैं ?
हमारी एक मित्र हैं जिनकी बेटी जन्मदिन के अवसर पर किसी ने उसे किचन सेट गिफ्ट में दिया ........इस पर हमारी मित्र थोड़ी नाराज़ हो गईं औ
र कहने लगीं की लोग लोग लडकियों को अक्सर किचन सेट या डॉल वैगरह गिफ्ट में देते हैं जो मुझे अच्छा नहीं लगता ............मुझे इस सोंच पर बहुत हैरानी हुई क्योंकि वह एक बहुत ही पढ़ी लिखी प्रगतिशील विचारों वाली महिला हैं .................मुझे समझ नहीं आता की कोई भी काम कोई भी खेल या जिंदगी का कोई भी छेत्र कैसे निर्धारित कर सकता की ये काम प्रथम दर्जे का है और ये काम दोयम दर्जे का है ??......
ये सौ प्रतिशत हमारी सोंच पर निर्भर करता है ........मैं एक हाउस वाइफ हूँ लेकिन मैंने कभी भी अपने आप को दोयम दर्जे का नहीं समझा अगर हम अपने आपको को ही अपनी नजरों में
नहीं उठा सकते तो फिर दुसरे की नजर से सम्मान पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ............
हमने खुद ही ये निर्धारित कर रखा है कि लड़कों द्वारा किया जाने वाला हर काम प्रथम दर्जे का है और घर -गृहस्थी के सारे काम दोयम दर्जे का क्योंकि ऐसा मानना है की इन सब कामों को करने के लिये किसी तरह की ज्ञान या रचनात्मकता की आवश्यकता नहीं है ............
मुझे हंसी आती है इस तरह की सोंच रखने वाले सो कॉल्ड इंटेलेक्चुअल के उपर ................ये क्या जाने कि होम मनाग्मेंट नाम की भी एक चीज़ होती है इसमें कहीं ज्यादा ज्ञान और रचनात्मकता की आवश्यकता की जरूरत होती है ...........इसलिए प्लीज अपनी सोंच को जरा उड़ान भरने दें ,पंख खोलने दें फिर हर काम
Saturday, January 12, 2013
malpua....
मालपुआ बनाने के लिए 250 ग्राम मैदे को 500 ग्राम फुल क्रीम दूध में घोल कर बैटर बनायेगे .......फिर इसमें 100 ग्राम मावे को सुनहरा भुन कर बैटर में मिलायेंगे ...........फिर इसमें 50 ग्राम बादाम ,50 ग्राम काजू ,50 ग्राम ग्रेटेड नारियल को मिक्सी में कूट कर डालेगे ............इस बैटर को घी में डीप फ्राई करेंगे
अब चाशनी तैयार करने के लिए के कटोरी चीनी में एक कटोरी पानी मिलाकर गैस पर रखेंगे जब इसमें उबाल आ जाये तो इसमें कुटी छोटी इलाइची और एक चुटकी केसर डालेंगे .............अब तले हुए मालपुआ को एक-एक कर के चाशनी में डालेंगे और थडी देर बाद चाशनी से निकाल कर किसी सूखे बर्तन में रखेंगे ......गर्मागर्म परोसें ....... :)
अब चाशनी तैयार करने के लिए के कटोरी चीनी में एक कटोरी पानी मिलाकर गैस पर रखेंगे जब इसमें उबाल आ जाये तो इसमें कुटी छोटी इलाइची और एक चुटकी केसर डालेंगे .............अब तले हुए मालपुआ को एक-एक कर के चाशनी में डालेंगे और थडी देर बाद चाशनी से निकाल कर किसी सूखे बर्तन में रखेंगे ......गर्मागर्म परोसें ....... :)
Thursday, January 10, 2013
pittha
बिहार -झारखंड की एक प्रचलित रेसेपी है पिट्ठा जो बिलकुल हल्का होता है और बिना तेल मसाले के बनता है .........इसके लिए चने की एक कटोरी दाल को 1-2 घंटे भिगो देंगे ...........उसके बाद 3-4 कलियाँ लहसुन और अदरख के साथ मिक्सी में पीस लेंगे ........अब इसमें साबुत जीरा ,हींग ,कटा हुआ हरा धनियाँ स्वादनुसार नमक डालकर मसाला तैयार कर लेंगे ...............
अब गेहूं के आटे में हल्का नमक डालकर गुन्द लेंगे .........अब इसकी छोटी -छोटी पुरियां तैयार करके इसमें दल को भर लेंगे जैसे गुझिया बनाते है ........
अब एक पतीले में पानी उबाल लेंगे ...पानी जब उबलने लगे तब उसमें एक -एक कर के pittha दाल देंगे जब वो पकने लगेगा तो पानी के ऊपर आ जायेगा इसी तरह सारे पिट्ठा को उबाल लेंगे .....चाहें तो इसे ऐसे भी खा सकते है या इसको करी पत्ता ,राइ ,हरी मिर्च के साथ बघार भी सकते हैं ........ :)
अब गेहूं के आटे में हल्का नमक डालकर गुन्द लेंगे .........अब इसकी छोटी -छोटी पुरियां तैयार करके इसमें दल को भर लेंगे जैसे गुझिया बनाते है ........
अब एक पतीले में पानी उबाल लेंगे ...पानी जब उबलने लगे तब उसमें एक -एक कर के pittha दाल देंगे जब वो पकने लगेगा तो पानी के ऊपर आ जायेगा इसी तरह सारे पिट्ठा को उबाल लेंगे .....चाहें तो इसे ऐसे भी खा सकते है या इसको करी पत्ता ,राइ ,हरी मिर्च के साथ बघार भी सकते हैं ........ :)
Wednesday, January 9, 2013
अक्सर ये बहस छिड़ी रहती है कि एक हाउस वाइफ की जिंदगी अच्छी है एक जॉब करने वाली महिला की? कौन ज्यादा सुखी है या दुखी या यों कहें की कौन ज्यादा परफेक्ट है ...जॉब करने वाली महिलाओं का मानना है कि वे दोहरी जिम्मेदारियां निभाती हैं इसलिए वे अपने आप को ज्या दा परफेक्ट या यों कहें कि दुनियां के कदम से कदम मिलाकर चल सकती हैं ..............हाउस वाइफ के बारे में अक्सर उनकी राय यही होती है कि ये बस चूल्हा -चौकी ,घर बच्चे के अलावा कुछ नहीं जानती ...........इनसे बात करने के ज्यादा टॉपिक भी नहीं होते इनसे तो बस बच्चे,पति,कामवाली ,खाने-पीने की ही बातें की जा सकती हैं ये क्या जाने दुनियां में कहाँ क्या हो रहा है .....................
जबकी हाउस वाइफ की राय इनके बारे कुछ एसा है .........की इनको क्या है सारा काम तो ये अपनी कामवाली से करवाती हैं न इन्हें खाना बनाने की झंझट है न बच्चे पालने की झंझट .........सुबह घर से निकल जाओ शाम को जब घर लौटो तो सारा काम हो ही जाता है .............इनके पति भी घर का बहुत काम करते हैं रही सही कसर इनके मम्मी -पापा या सास ससुर पूरी कर देते हैं ......हम तो बिना सैलरी सारी ज़िन्दगी पिसे रहते हैं ...............ऊपर से ये भी कि इन्हें क्या इनके पास तो टाइम ही टाइम है सारा दिन तो घर पर आराम करती हैं .................मेरा तो ये मानना है की कोई भी काम आसान नहीं है अगर उसे पूरी कमिटमेंट के साथ किया जाये ........किसी के भी काम को कम कर के नहीं आंका जा सकता। ये सोंच भी गलत है कि हाउस वाइफ के पास बहुत टाइम होता है,.........एक हाउस भी बुद्धिजीवी हो सकती है ..........क्रेअटिव हो सकती एसी बहुत सारी मिसाल हमारे समाज में उपस्थित हैं ...........उसी तरह एक काम पर जाने वाली महिला के सीने में भी दिल होता है ....उन्हें भी अपने बच्चों ..अपने घर ...अपने पति से उतना ही प्यार होता है जितना एक हाउस वाइफ को ........
जबकी हाउस वाइफ की राय इनके बारे कुछ एसा है .........की इनको क्या है सारा काम तो ये अपनी कामवाली से करवाती हैं न इन्हें खाना बनाने की झंझट है न बच्चे पालने की झंझट .........सुबह घर से निकल जाओ शाम को जब घर लौटो तो सारा काम हो ही जाता है .............इनके पति भी घर का बहुत काम करते हैं रही सही कसर इनके मम्मी -पापा या सास ससुर पूरी कर देते हैं ......हम तो बिना सैलरी सारी ज़िन्दगी पिसे रहते हैं ...............ऊपर से ये भी कि इन्हें क्या इनके पास तो टाइम ही टाइम है सारा दिन तो घर पर आराम करती हैं .................मेरा तो ये मानना है की कोई भी काम आसान नहीं है अगर उसे पूरी कमिटमेंट के साथ किया जाये ........किसी के भी काम को कम कर के नहीं आंका जा सकता। ये सोंच भी गलत है कि हाउस वाइफ के पास बहुत टाइम होता है,.........एक हाउस भी बुद्धिजीवी हो सकती है ..........क्रेअटिव हो सकती एसी बहुत सारी मिसाल हमारे समाज में उपस्थित हैं ...........उसी तरह एक काम पर जाने वाली महिला के सीने में भी दिल होता है ....उन्हें भी अपने बच्चों ..अपने घर ...अपने पति से उतना ही प्यार होता है जितना एक हाउस वाइफ को ........
Saturday, January 5, 2013
Ardhya Satya ?
हम सब मानसिक रूप से मर चुके हैं ..........हमारी सोंचने समझने की शक्ति दम तोड़ रही है खुद को बुद्धिजीवी सझने वाले हम जैसे लोगों की समझ उस वक्त कहाँ चली जाती है जब इसकी जरुरत होती है?
हम कैसे किसी को रास्ते पर गिरा हुआ देखकर आगे बढ़ सकतेहै ?कल को उस जगह पर हमारा कोई अपना भी तो हो सकता है ........लेकिन हमें क्या हमारे पास इतना वक्त कहाँ जो हम इतना सोंचे .............
हमें सिर्फ अपने अधिकार मालूम होते हैं .......हमारी कुछ दायित्व भी है इससे हमें कोई सरोकार ही नहीं है .........
मैं भी शायद उस जगह पर होती तो मैं भी नहीं रूकती मैं भी यही सोंचती की कौन पुलिस के झमेले में पड़े ........क्या मेरा ऐसा सोंचना गलत होता ? नहीं, क्योंकि मैं एक बार एसा कर के फंस चुकी हूँ ..........मैं भी अपने दायित्व को भूल चुकी हूँ ...........हमारे समाज में कुछ की लोग हैं जो सचमुच में जीते हैं .............जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर है ............या जिनके पास अथाह धन सम्पत्ति है जो सत्ता को अपने अधीन रख सकते हैं ..............
हमारे जैसे लोगों को पुलिस से सहायता मांगना जो किसी भी देश की नागरीक का मौलिक अधिकार होता है "एक भयानक सपने" के समान है ........मैं तो हर दिन यही प्रार्थना करती हूँ की इस देश में किसी को भी डॉक्टर ,नेता और पुलिस से पाला ना पड़े ............सुनने और सुनाने में तो ये बातें काफी घिसीपिटी लगती है पर है बिलकुल सत्य .......
Thursday, January 3, 2013
rishte..
जब हम होंगे साठ साल के और तुम होगी पचपन की ..........एक पुराना गाना सत्तर के दशक का आज के ज़माने में कुछ बेमानी हो गया है टूटते रिश्तों का आज का हमारा समाज शायद इस गाने को गुनगुना भी नहीं पायेगा
" इट्स माय लाइफ" की मानसिकता कम से कम मेरी समझ के तो परे है ...,हमारे बुजूर्ग कहा करते थे की शादी दो परिवारों का मिलन होता है पर आजकल सारी जिम्मेदारिओं को पीछे छोड़कर एक उन्मुक्त जीवन जीने की चाह ही प्राथमिकता है इतने पर भी बस हो जाता तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती ......दिन बीतते न बितते दो लोग भी एकदूसरे को बर्दास्त नहीं कर पाते .........फिर शुरू हो जाता है सड़े -गले रिश्तों की शुरुआत .......जिसमे एकदूसरे के उपर दोषारोपण के अलावा कुछ नहीं होता ........
फिर शुरू होता उस रिश्ते से निकले की प्रक्रिया और जबरन अपनेआप को खुश रखने की मशकत ........हम जिंदगी में कितने बड़े -बड़े कोम्प्रोमाईज़ कर लेते है पर छोटे -छोटे कोम्प्रोमाईज़ नहीं कर पाते। कितनी अजीब बात है ना ..............
" इट्स माय लाइफ" की मानसिकता कम से कम मेरी समझ के तो परे है ...,हमारे बुजूर्ग कहा करते थे की शादी दो परिवारों का मिलन होता है पर आजकल सारी जिम्मेदारिओं को पीछे छोड़कर एक उन्मुक्त जीवन जीने की चाह ही प्राथमिकता है इतने पर भी बस हो जाता तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती ......दिन बीतते न बितते दो लोग भी एकदूसरे को बर्दास्त नहीं कर पाते .........फिर शुरू हो जाता है सड़े -गले रिश्तों की शुरुआत .......जिसमे एकदूसरे के उपर दोषारोपण के अलावा कुछ नहीं होता ........
फिर शुरू होता उस रिश्ते से निकले की प्रक्रिया और जबरन अपनेआप को खुश रखने की मशकत ........हम जिंदगी में कितने बड़े -बड़े कोम्प्रोमाईज़ कर लेते है पर छोटे -छोटे कोम्प्रोमाईज़ नहीं कर पाते। कितनी अजीब बात है ना ..............
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