Sunday, February 8, 2015

Maggie pakoda....

मैगी पकोड़ा बनाने की सामग्री 
मैगी। ....... 1 pkt
बारीक़ कटा प्याज। …… 1 cup
बारीक़ कटा हरी  मिर्च। ……… 1 tea spoon
गर्म मसाले। ……… 1 tea spoon 
ब्रेड। ……। 8 slice
स्वद्नुसार नमक 
तलने के लिए तेल 
सबसे पहले मैगी को बना लेंगे जैसे नॉर्मल मैगी बनती है। ....... अब इस उबले हुए मैगी में प्याज़,हरी मिर्च ,गर्म मसाला डालकर अच्छी तरह मिक्स कर लेंगे। अब इस मिक्स को भीगे हुए ब्रेड में  भर कर रोल बना लेंगे। ……… इस रोल को डीप फ्राई कर लेंगे लीजिये गर्मागर्म मैगी  पकोड़ा तैयार है। 
हरी चटनी के साथ परोसें। ....:)

Akhand Jyoti se.....

घटना रूस के साइबेरिया क्षेत्र की है। बहुत वर्षों पहले वहां एक छोटा सा गाँव हुआ करता था ,जो अपनी अनूठी परंपरा के लिया विख्यात था। परंपरा यह थी कि गांववाले अपनी जमीन बिना किसी मूल्य के किसी भी आगंतुक को दे दिया करते थे ,यदि वह उनके द्वारा रखी गई शर्तों को पूर्ण कर दें। यह बात अलग थी कि वे शर्त क्या रखते थे ,इसका पता किसी को भी नहीं लग पाया था। ऐसी ही किववदंतियों  को सुनकर एक किसान उस गांव में पहुंचा। उसने गंवालों से जब इस परंपरा के विषय में पूछा तो गाँवलों ने इसकी पुष्टि की और उअसे गांव के प्रधान के  पास ले गए। गांव का प्रधान उसे देखकर जोर से हंसा और बोला " लो एक और गधा आ गया। " किसान सुनकर आश्चर्यचकित हुआ  और पूछने लगा " आप हँसे क्यों ?" गाँव का प्रधान बोला -" हंसने की बात यह है कि यहाँ तो लगभग हर दिन ही कोई न कोई इस शर्त का पता लगाने आता है , पर आजतक उसको जीत कर कोई वापस नहीं लौटा। " किसान ने पूछा - " शर्त क्या है?" ग्राम प्रधान बोला -" सारी जमीन तुम्हें  निःशुल्क उपलब्ध है। इसके लिए मात्र एक शर्त है कि तुम  यहाँ खींची रेखा से  सूर्योदय से दौड़ाना शुरू करोगे और सूर्यास्त होने तक जीतनी जमीन नापकर तुम इसी रेखा तक आ जाओगे ,उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी ,पर यदि नहीं आ पाये तो  तुम्हें आजन्म गुलाम बनकर यहीं रहना पड़ेगा। "
            किसान को लगा यह तो बड़ी ही आसान शर्त है और उसने तुरंत हाँ  भर दी। सूर्योदय पर उसने भागना शुरू किया और दोपहर  होने तक उसने सात - आठ मील जमीन नाप ली तो उसका लालच बढ़ने लगा। उसने साथ लाया भोजन और पानी वहीँ छोड़ा और सोंचा कि एक दिन नहीं भी खाया तो क्या ,आज ज्यादा से ज्यादा जमीन नाप लेते हैं। भागते - भागते    दोपहर के तीन बज गए , पर ज्यादा जमीन का लालच उसे दूसरी तरफ खींचे जाता था। मन मारकर वह वापस लौटा तो खींची रेखा से आधा मील दूर जमीन पर गिर पड़ा। ग्राम प्रधान वहीँ पास खड़ा था और उससे बोला "शर्त आसान है ,परन्तु मनुष्य के लालच का अंत नहीं। इसलिए आजतक इस शर्त को पूरा करने वाला कोई नहीं मिला और जितने गांव वाले दिखाई पड़ते हैं ,ये सब शर्त हारे हुए गुलाम ही हैं। ...."

kartvya palan...

 पूर्व दिशा  में उषा की लालिमा दिखाई देने लगी। अन्धकार के विदा होने का समय निकट आ गया। भगवान भास्कर भी अपने रथ पर सवार होकर गगन पथ पर आगे बढ़ने  लगे। उन्होंने देखा कि अंधकार से लड़ता एक दीपक एकाकी खड़ा है। दीपक  की लौ ने अपना मष्तक उठाकर  सूर्य को प्रणाम  किया। सूर्य देव को यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि दीपक ने अपना कर्तव्य अच्छी प्रकार निभाया है। उन्होंने दीपक की प्रशंसा की। दीपक सहज भाव से बोला --" सूर्यदेव ! संसार में अपने कर्तव्य पालन से बढ़कर कोई पुरस्कार हो सकता है ,मैं नहीं  जानता। मैंने तो आपके द्वारा दिए गए  उत्तरदायित्वों  का निर्वाह किया है ,इसमें प्रशंसा की बात ही क्या ?" सूर्यदेव संतुष्ट होकर आगे बढ गये. दिए गए कर्तव्य की पूर्ति महानता का प्रतीक होती है। 

Friday, February 6, 2015

akhand Jyoti se

एक किसान अपने परिवार के साथ रामपुर गाँव में रहता था। उसमें और उसकी पत्नी में प्रतिदिन किसी न किसी बात पर झगड़ा होता। दोनों एक दूसरे से कुपित हो जाते और फिर कई दिनों तक बातचीत न करते। यह सब देखकर किसान के बैलों ने उन दोनों को शिक्षा देने की सोंची। अगले दिन जब किसान खेत में हल लेकर निकला तो दोनों बैल अलग- अलग दिशा में जाने लगे। किसान ने दोनों बैलों को मनाने का बहुत प्रयत्न किया ,पर दोनों अलग - अलग  होने से उस दिन  की खेती का काम नहीं हो सका। किसान लौटकर ये बात अपनी पत्नी से कह रहा था तब बैल उससे बोले ---"मालिक !हम झगड़े का नाटक मात्र आप दोनों को शिक्षा देने के लिए कर रहे थे। हम दोनों तो पशु हैं ,यदि हम अलग - अलग दिशा में जाते हैं तो आपका कितना काम प्रभावित होता है। आप सोचें की यदि आप और मालकिन में मतभेद रहेगा तो उससे घर की सुख - शांति कितनी प्रभावित होगी। " किसान और उसकी पत्नी की समझ में आया कि पति  और पत्नी ,दोनों गाड़ी की दो पहियों की तरह हैं। उनके साथ चलने में ही सुख है ,अन्यथा विग्रह होने से दोनों का ही नुकसान है ,लाभ किसी का नहीं। :)

Thursday, February 5, 2015

akhand jyoti se

एक अमीर  आदमी समुद्र में मनोरंजन की द्रिष्टि से अपनी नाव लेकर निकला। नाव चलाते चलाते उसे पता ही नहीं चला कि  वह समुद्र में दूर निकल आया है और मार्ग भटक गया है। अपनेआप को अकेला जान वह बहुत घबराया और ईश्वर को याद करने  लगा। बहुत देर तक जब कोई मदद नहीं  पहुंची तो  क्रोध में भर कर वह ईश्वर को कोसने लगा कि ईश्वर भी कितना निष्ठुर है ,देखो मैं कितनी कठिनाई में हूँ और मेरी सहायता के लिए कोई भी उपलब्द्ध ही नहीं।
थोड़े समय में रात  हो गई। नाव बहते - बहते एक किनारे जा लगी। वहां तेज हवा चल रही थी ,जिसके कारण नाव के चप्पू आपस में रगड़े और उनमें आग लग गई। अब तक अमीर आदमी अपने जीवन की आशा छोड़ चूका था।  मन में पूरी निष्कामता  साथ  उसने भगवान  को याद किया और बोला। ....... " हे प्रभु ! मैंने तुझे मात्र स्वार्थ और अहंकार की पूर्ति के लिए ही याद किया है। जब तक मेरी इक्छाएँ  पूर्ण होती रही , मैं तुझे पूजता रहा और ऐसा न होने पर मैंने तुझे दुर्वचन भी बोले। मेरे वापस लौटने का एकमात्र सहारा नाव भी अब नहीं है। जीवन समाप्त होने से पूर्व अपने कर्मों के लिए क्षमा मांगता  हूँ। " उसका इतना कहना था कि एक अपरचित नाव किनारे  लगी   , एक व्यक्ति उतरा  और बोला -----"यहाँ आग जलती देखी तो  मदद  के लिए आ पहुंचा। लगता है तुम परेशानी में हो  "  अमीर आदमी को भान हुआ कि भगवान निष्कामता को  प्रेम करते हैं ,स्वार्थवश किये गए कर्मकांडों को नहीं। 

Tuesday, February 3, 2015

Short story....

एक दिन शरीर की इन्द्रियों ने सोंचा कि हम लोग परिश्रम करते -करते मर जाते हैं और यह पेट हमारी कमाई को मुफ्त में ही खाता रहता है। अब से हम कमाएंगे तो हम ही खाएंगे अन्यथा काम करना बंद कर देंगे। इस सुझाव पर सबने सर्वसम्मति से हाँ भरी।  पेट को इस प्रस्ताव का पता चलने पर उसने सभी इन्द्रियों को सझाया। ……… मैं तुम्हारी कमाई स्वयं नहीं खाता हूँ। जो कुछ भी तुम देती हो ,उसे तुम्हारी शक्ति बढ़ाने के लिए तुम्हारे पास भेज देता हूँ। वश्वास रखो ,तुम्हारा परिश्रम तुम्हें वापस मिल जाता है ,परन्तु यह बात किसी इन्द्रियों को समझ में नहीं आई। प्रस्ताव के अनुसार सभी इन्द्रिओं  करना बंद कर दिया।
पेट क्षुधा से तड़पने लागतो वह अन्य अंगों  को ऊर्जा दे पाने में भी असमर्थ रहा। परिणामस्वरूप सरे अंगों की शक्ति नष्ट होने लगी। इस स्थिति से सारे अंग घबराये। तब मस्तिष्क ने इन्द्रियों से कहा. -----"मूर्खों ! तुम्हारा परिश्रम कोई नहीं खा जाता। वह लौट कर तुम्हें ही वापस मिलता है। यह न  सोचो कि दूसरों की सेवा करके तुम्हारा नुकसान   होता है ,वस्तुतः जो कुछ तुम दूसरों को देती हो ,वह ब्याज़ सहित तुम्हारे पास लौट आता है। " अब इन्द्रिओं को सहकार और सहयोग की वास्तविकता समझ में आ गई। उन्होंने  पुनः काम करना प्रारम्भ का दिया।  

Sunday, February 1, 2015

Chicken soup......

Serve for four.......
सामग्री। ....चिकेन ब्रेस्ट---300ग्राम 
लहसुन। ....... 5 कली 
अदरख। ……… 1"      
बड़ी इलाइची। ......2. 
छोटी इलाइची। ……2
दालचीनी। …1"……। 
काली मिर्च। ....... 7
प्याज़। ……1
 दही। .......1/2 कप 
दूध। ……1/2कप
कॉर्न फ्लोर। ........2 tea spoon
Lemon ......1 
नमक स्वादुनसार 
चिकेन को अच्छे से धो लेंगे। .... 
दूध और दही को छोड़कर  …… बाकी सारी सामग्रीओं को मिलाकर  एक कूकर में चार कप पानी डालकर उबाल लेंगे। … उबालने के बाद चिकेन स्टॉक को अलग कर लेंगे बाकी बचे सारी  सामग्रीओं को मिक्सी में पीस लेंगे। ……… इस पिसे हुए सामग्रीओं को चिकेन स्टॉक में मिलाकर  फिर से गैस पर रखेंगे। ……। अब दूध और दही में दो चम्मच कॉर्न फ्लोर मिलाकर  चिकेन स्टॉक में मिलाएंगे। …। एक उबाल आने तक पकाएंगे। चिकेन ब्रेस्ट को श्रेड कर के इसमें  मिलाएंगे।
लीजिये चिकेन सूप रेडी है। …… स्वादनुसार लेमन डालकर गर्मागर्म सर्व करें। ……… !!